Tuesday, September 23, 2008

फिर एक बार लढना हे सैतान से

इक बूंद आंसू मेरी मन की आँखों से टपक पड़ी,
लगा सायद में रो रहा हूँ अपनी बेबसी जूझ कर,
ज़हर मेरी बुजदिली की जला रही हे ये बदन को,
अब खड़ा हूँ मौत की इंतजार में जिंदगी को भूल कर|

हेवानियत की इन्तहा हो गई हो जेसे इस दुनिया में,
खून की चादर लपेटे हुए आ खडा हे सैतान मेरे सामने,
में तो था एक अल्लाह का बन्दा इस इंसान के भेस में,
हाए ये में क्या कर राहा हूँ बयान ना कर सकूँ अपनी जुवामे|

बह रही हे खून की नदिया अपनी की अपनों के हाथों,
ना कुछ कर सका सिर्फ़ खड़ा हो कर देख रहा हूँ,
हूँ एक वेहेम में की मेरा क्या जाता हे जो में रोऊँ,
सायद पता नही कल रोना पड़े मुझे खून की आंसू|

हे अलाह के बन्दे जाग उठ इस गेहेरे नींद से,
वक्त ने आवाज दी हे लढना हे फिर इक बार सैतान से|

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