8:06 AM

फिर एक बार लढना हे सैतान से

इक बूंद आंसू मेरी मन की आँखों से टपक पड़ी,
लगा सायद में रो रहा हूँ अपनी बेबसी जूझ कर,
ज़हर मेरी बुजदिली की जला रही हे ये बदन को,
अब खड़ा हूँ मौत की इंतजार में जिंदगी को भूल कर|

हेवानियत की इन्तहा हो गई हो जेसे इस दुनिया में,
खून की चादर लपेटे हुए खडा हे सैतान मेरे सामने,
में तो था एक अल्लाह का बन्दा इस इंसान के भेस में,
हाए ये में क्या कर राहा हूँ बयान ना कर सकूँ अपनी जुवामे|

बह रही हे खून की नदिया अपनी की अपनों के हाथों,
ना कुछ कर सका सिर्फ़ खड़ा हो कर देख रहा हूँ,
हूँ एक वेहेम में की मेरा क्या जाता हे जो में रोऊँ,
सायद पता नही कल रोना पड़े मुझे खून की आंसू|

हे अलाह के बन्दे जाग उठ इस गेहेरे नींद से,
वक्त ने आवाज दी हे लढना हे फिर इक बार सैतान से|

1 comments:

Erra said...

Jindegi me pehli bar hindi text padh k lag vag 75% words k matlub mamajh me aya..our theme yani ki tumahare post k piche jo tumhare vabnayen hey..sayad samajh gayi... thik hi kaha hey tum ne...hum sarif log sab dekhte hein per kar kuch v nehin pate..yehi to meri v dukh hey... per meri ek tamanna hey ki me jo kuch v dekhun ager kuch kar sakun to jarur karungi..woqt ki awaj mujh tak pahanch jati hey per kuch apne josh se nehin kar pa rahi hun..kuon ki avi tak independent nehin hui hun...

achha hua ki tumhare our meri soch kafi milti hey..me express nehin kar pati our tum etne achhe express karte ho ki padhne wale ka jamir jag uthega..seitan se ladhne k lia..

keep it up dear...