12:05 PM

जीन्दगी की केहेर !!!

बरसों हो गए हे जब में आख़िर बार मुस्कुराया था | मुझे ये भी पता नहीं के इसे क्या था जो मुस्कुराने को मजबूर कियाथा | वो सब सुनेहेरी पल में काहाँ पे छोड़ आया हूँ ये भी पता नहीं | में थिक से साँस भी नही ले पा राहा हूँ, मगर कुछ अनजानी सी मुझे उन सब के साथ आगे बढ़ने को कह रही हे | जाहान भी देखूं, मुझे सिर्फ़ कंकाल दीख रही हे | ये सब क्या धुंद रहे हें, में पूछ भी नहीं सकता | वो दर्वानी ऑंखें, वो बिना होंठ की मुंह ना कह पाने की अपनी मज़बूरी बता रहे हें | इसीलिए मेने खुदको पूछा, में याहां पे कया कर राहा हूँ | कोई जवाब अबतक नहीं | अबतक खडा हूँ इस जाहानुम में और ढूँढ ता फिर राहा हूँ किसीकी एहसान की | में किसीको पहचान भी नहीं पा राहा हूँ जिसके साथ बात थोडा कर सकूं | सब एक जेसे, भावनाहीन, रक्तहीन और कमजोर | में उसको बुलाने की कोसिस कर राहा हूँ, मेरे जुवान जेसे बंद हो गई हे | मेरे अतीत जेसे जोई केहेर बरसा राहा हे...

2 comments:

Gyanaranjan said...

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Suvendu said...

Actually sir this is a nice blog for me specially i like this blog.
bole to ekdam jhakas .
sir jara apunke blog ki taraf bhi thoda apna rukha bhi kar lena aur ek comment jarur chhodne ka apunko achha lagega .Jay Hind Sir
suvendu.blogpico.com