Friday, May 23, 2008

एक इत्फाक मेरी जीन्दगी में !

ये एक इत्फाक की बात हे की हम दोनों एक ही ट्रेन में सफर कर रहेथे | तक्रिवन साल के बाद मेने उसे देखा | काफ़ी बदलाव गया था उसमे | में तो सोच राहाथा की वो मुझे पहचान पाएगी भी या नहीं | मगर आख़िर में मेन्ही ग़लत सवित हुआ | हाँ वो सयद थोडी काली थी मगर ये उसे जाच रहाथा | एक ही नजर में वो मुझे पहचान गई थी | पहले से काफी अच्छी दिख रही थी | वो उलझी बाल, वो सिम्प्ले कपडा अब नहीं राहा | वो तो पूरा मोदेर्ण हो छुकी थी | जो भी थी मगर दिल को भा देने बाली थी | ट्रेन अपनी राप्तार में था | बाहार धुप भी खीली हुई थी जेसे सूरज अपनी कहर बरसा राहाथा | दो तीन बार मेने आँख लाधाने की कोसिस की मगर कर नहीं पाया | सायद मेरी कमजोरी थी | मुझे लगता हे की वो भी एसिही कुछ फीलिंग्स पे थी | जो भी हो इतना तो सुकून मिला के वो मिली मुझे | मेरे कहने का मतलब हे ये हे की अब तो कोई बाहाना मिले उस से मिलने केलिए | मुझे अब भी पता नहीं उसे ये महसूस हो रहा होगा या नहीं | मगर में मनही मन खुस था | में रोज उसे कॉलेज से लौटने के बाद उस से धुन्दता फिरता था | कौन से डिब्बे में बो बेठी होगी | और जब बो दिख जाती थी मानो जेसे मुझे सारा आस्मां मिल गया हो | दो तीन दीन तो इसे ही बीत ते गए | कोई अफसोस ही नहीं थी इस बात की के वो मुझे मिउन कुछ नहीं बोलती थी या में उस से किउन कुछ पूछ नहीं पा राहा था | मेने ये सब बात अपने दोस्त को बोलता था रोज रात को | वो बोला तू बतादेता कुन नहीं, बात चित सुरु किउन नहीं करता? मेने ठान लिया के आज ही पूछ कर छोडूंगा उसे | जब ट्रेन में मुलाकात हुई तो वोही रोज बाली बात, वो हँसी, वो छुप छुप के देखना, वो देख कर ना देख ने का बाहाना | में रोज की तरह आगे ट्रेन से उतर ने के बजाये थोरा रुक के उसके पीछे खडा राहा | और जेसेही हम दोनों उतरे वो सदंली मुझे वोली, "है! केसे हो? पहचान नहीं पा रहे हो जेसे, इसे देख रहे हो मुझे ट्रेन में? क्या बात हे मिआं, कुछ और इरादा हे क्या?" मेरे सारे किए कराये पर पानी फेर दिया | चलो छोड़ कुछ तो बनी बात | कुछ दूर तक दोनों चलके गए | और वो निकल पड़ी अपनी कम्पूटर क्लास के तरफ़ और में निकल पडा अपने हॉस्टल के तरफ़ | एक दिन मुझे एक कॉल आया | कुछ सुन ते ही मेने उसकी आवाज पहचान लिया | और जेसे ही वो बोलती गई मेरे नव्ज़ ढीले पड़ते गए | मेरे दिमाग जेसे काम करना छोड़ दिया हो | मेने फोन काट दिया | बड़ा अफ़सोस लगा लगा, मगर टैब मुझे जो थिक लगा मेने वोही किया | उसकी सगाई होने बाली थी और वो मुझे अपनी खुसी इजहार कर रही थी | ना में तबसे उसे देखा हूँ ना मिलने की उमीद कर रहा हूँ | सोचाथा अगर वो मेरी जिंदगी में आयेगी तो मेरी जिंदगी स्वर सकती हे | मगर भगवान् को ये सयद मंजूर नहीं था | सोचाथा कुछ हो नाहो अपनी ये अकेलापन तो दूर हो सकती हे | नहीं ये नहीं हुआ | फिर वोही रोज बाली बात | वोही ट्रेन, वोही लोक, वोही कड़ी धुप | कुछ नहीं बदला | में फिर वोही अकेला, फिर इंतज़ार में | कोई तो आयेगी मेरे जिंदगी में | वो आई इत्फाक से, मिली इत्फाक से और चली भी गई इत्फाक से...

2 Comments:

Blogger APURVA said...

ittafak aisi ho ki ki koi gham reh jaye..ya to phr koi jindagi bhar ki khusi mil jaye...ya to phr khusi milte milte kahin kuch na kuch adhura reh jaye..aur bhi zyada conversation n diologues hote ..thn it hav been fabulous..it shud hav beeen morelive kind of storytelling....othrwise it ws a gud work..

May 26, 2008 at 10:08 AM  
Blogger ravi said...

its an interesting blog created by you .very good....keep it up..

May 28, 2008 at 5:58 AM  

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